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सोमवार, 9 अक्तूबर 2017

20 साल से आवेदन देकर थक चुके थे ग्रामीण जब खुद सडक बनाने की ठानी तो प्रशासन ने डाला जेल में

प्रशासन की दोहरे कार्यवाही व विकास से त्रस्त कावापाल के आदिवासी अब संविधान की लड़ाई के मूड में
कावापाल के सरपंच,माटी पुजारी,सिरहा व 6 स्कूली बच्चो सहित 56 आदिवासी जेल में क्योकि इन्होने भाजपा राज में विकास करने की जहमत उठाई
बस्तर - बस्तर संभाग के तहत बस्तर जिले के अंतर्गत ग्राम कावापाल इन दिनों अखबार की सुर्खियों में है, कावापाल के सरपंच,माटी पुजारी,सिरहा व 6 स्कूली बच्चो सहित 56 आदिवासी जेल में है, ये आदिवासी जेल में इसलिए है कि इन्होने विकास का  जहमत उठाया वही विकास जिसे केंद्र की मोदी सरकार से लेकर राज्य की रमन सरकार ढिढोरा पिटते रहती है 70 सालो में विकास नामक चिड़िया का ग्राम के आदिवासियों ने शक्ल तक नही देखी है, न पीने के लिए पानी है, न चलने के लिए सडक और न ही जगमगाती बिजली, सडक मार्ग दुरुस्त करने के लिए ग्रामीणों ने संविधान के अनुच्छेद 244(1) व नवी अनुसूची पंचायत राज अधिनियम 1996 के अनुसार ही पारम्परिक ग्राम सभा कर सड़क निर्माण करने हेतु 753 पेड़ काटे थे, कावापाल ग्राम बस्तर संभाग के जगदलपुर से मात्र 30 किमी की दुरी पर स्थित है, बस्तर की विकास की झूठी तस्वीर यहा साफ़-साफ दिखाई देती है दर्जनों आदिवासी स्वास्थ्य सेवा न मिलने के चलते मौत के मुंह में समा गए है, बारिश के दिनों अथवा रात में किसी ग्रामीण को अगर बिमारी हो गया तो उसका मृत्यु तय है  बारिश अथवा रात में मोटर साइकल चलाना मुश्किल है. दो बार गाँव के बीमार लोगों को अस्पताल में मौत हो गई तब लाश को पहुंचाने गई शव वाहन बीच जंगल में सड़क नहीं होने के कारण लाश उत्तार कर भाग निकले दूसरे दिन ग्रामीण लकडी की काठी बनाकर लाश को गांव पहुचाये। शिक्षा की बात करे तो एक प्राइमरी अथवा मिडिल स्कूल ग्राम में मौजूद है लेकिन गुरूजी दर्शन नही देते क्योकि गांव  पहुँच मार्ग नही है.

ज्ञात हो कि बस्तर संभाग के माचकोट वन क्षेत्र अंतगर्त कावापाल ग्राम के ग्रामीणों ने 7 किमी सडक बनाने के लिए 20 सालो से फारेस्ट ने अनुमति नही दी, विभाग रिजर्व फारेस्ट क्षेत्र बताता रहा जब ग्रामीणों ने विकास की चाह में पेड़ काटे तो उन्हें जेल में डाल दिया गया.जबकि वही वन विभाग नगरनार स्टील प्लांट के लिए शबरी नदी से पानी पाइप लाइन के लिए 30 किलोमीटर 10 फिट चौड़ाई में 6000 पेड़ काटने की अनुमति दे दी गई। इस पाइप लाइन से आदिवासियों की कोई नफा होने वाला नहीं है। आदिवासी प्राक्रतिक प्रेमी होते है वो जंगल, पहाड़ो, झरनों से आत्मीय लगाव होता है,पेड़ो को पूजते है जंगल की रक्षा करते है, पौधा रोपड़ का ढोंग नही रचते, वृक्षों के असली मालिक वही है, जहाँ जहाँ आदिवासी हैं उन्ही क्षेत्रों में सघन जंगल हैं। यह साबित करती है कि आदिवासी जंगल के सरंक्षक है। यदि विनाशक होते तो आज तक आदिवासी इलाकों में जंगल गायब हो गये होते, लेकिन उन्ही वृक्षो की कटाई के मामले में असंवेधानिक तरीके से उन्हें जेल भेज दिया जाए तो यह मौजूदा सरकार अथवा प्रशासन का तानाशाही रवेय्या के साथ ही दोहरा मापदंड नजर आती है।

निर्णय कावापाल में पारम्परिक ग्राम सभा का

प्रशासन द्वारा सड़क निर्माण नहीं करने से निराश होकर कावापाल में दिनाक 9-9-2017 को पारम्परिक ग्राम सभा का आयोजन किया गया जिसमे भारत में संविधान के अनुच्छेद 13(3) 244(1) में निहित विधि के अनुसार ग्राम में सर्वसम्मती से प्रस्ताव पारित किया गया तथा गांव की जिम्मीदरीन जलनी याया डाँड रावपेन से पारम्परिक अनुमति प्राप्त की गई, सड़क निर्माण की जद में कटने वाले पेड़ों की ग्राम वन सुरक्षा व प्रबंधन समिति कावापाल के द्वारा नीलाम कर इस आय का उपयोग गाँव की विकास योजनाओं में करने का निर्णय लिया गया। ग्राम में पारित प्रस्ताव में कहा गया गया ग्राम कावापाल से पुसपाल तक सडक मार्ग नही होने के चलते आवागमन अथवा मूलभूत सुविधाओं के लिए काफी दिक्कत का सामना करना पड़ता है,अब बच्चों की पढ़ाई, इलाज बिजली व दैनिक जरूरत की सामान की ढुलाई के लिए सड़क का निर्माण पूरे गांव के लोग श्रम दान करके ही रहेंगे। आजादी के 70 सालो बाद भी मूलभूत सुविधओं से ग्रामवासी वंचित है, ग्राम सभा के निर्णय में आगे कहा गया कि कावापाल से पुसपाल जाने वाली पगडंडी पर पुरे ग्रामवासी श्रम दान करके सडक निर्माण करने का निर्णय लेती है,मूलभूत सुविधावो को लेकर कई दफे जिला कलेक्टर, जन समस्या निवारण शिविर, जन दर्शन में प्रशासन को अवगत काराया गया लेकिन सडक निर्माण नही हुआ,

आजादी के 70 साल बाद भी गाँव में बिजली नही है, प्रशासन को अवगत काराया गया तो सोलर लाइट लगा दिया गया जो कुछ दिन चलने के बाद खराब हो गया. बिजली नही होने के चलते ग्राम के बच्चे शिक्षा से वंचित है वो पढ़ नही पाते जिसके कारण पूरा धुरवा समुदाय विकास से वंचित हो रही है । ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित किया गया कि जिला कलेक्टर एक माह के अंदर बिजली सेवा प्रदान करे, प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि देश के प्रधानमन्त्री डिजिटल इण्डिया की बात कहते है लेकिन ग्राम में मोबाइल नेटवर्क नही है कावापाल में 310 ग्रामीणों ने हस्ताक्षर अंगूठा लगा कर ग्राम सभा के प्रस्ताव को प्रशासन को सूचना दी गई फिर भी कोई सकारात्मक कदम नहीं लिया जाना संवेदशील क्षेत्र की प्रशासनिक निरंकुशता की ओर इशारा करती है।

विकास की गुहार लगाते रहे कावापाल के आदिवासी ग्रामीण

केंद्र अथवा राज्य सरकार विकास के अनेको दावे करती है, विभिन्न योजनाए आदिवासियों के लिए लागू करने की कहानी रची जाती है, विकास के तमाम योजनाए कावापाल में फिसड्डी साबित होते है, ग्रामीण स्वयं मूलभूत सुविधाओं की गुहार लगा रहे है लेकिन प्रशासन मूक दर्शक बनी रहती है सरकारे विकास के थोथे वादों तक सिमित रह जाते है आप को बता दे कि कावापाल के ग्रामीणों ने 27 जून 2016 को जनदर्शन में आवेदन देकर सडक निर्माण की गुहार लगा चुके है लेकिन ग्रामीणों का आवेदन रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया, ग्रामीणों ने थक हार कर सडक निर्माण का स्वयं जहमत उठाया और पेड़ कटाई कर सडक निर्माण करने लगे, लेकिन प्रशासन ने सरकारी सम्पति क्षति अथवा वन सुरक्षा अधिनियम के तहत 56 आदिवासी ग्रामीणों को जेल में डाल दिया गया. आज तक वन विभाग बस्तर क्षेत्र में लकड़ी तस्करों को नान बेलेबल धाराओं में कोई कार्यवाही क्यों नहीं की??? वन विभाग द्वारा जंगलों से गोला निकालने के लिये बड़े बड़े वृक्षों को काट कर सड़क बनाती है ताकि गोला निकाल कर बेच सके तब क्षति निवारण अधिनियम किसके ऊपर लगती है??? जगदलपुर से कांकेर तक सड़क चौड़ीकरण के नाम पर 10000 पेड़ काटे गये तब वन विभाग राष्ट्रीय सम्पदा क्षति निवारण अधिनियम के तहत किसके ऊपर कार्यवाही हुई???कौन जेल गया??? बस्तर संभाग के तहत कितने सड़क एक भी वृक्ष बिना काट के सड़क बनाया गया है??? यदि वृक्ष काट कर सड़क बनाया गया है तो उस सड़क निर्माण करने वाले अधिकारी ठेकेदार के विरुद्ध भी राष्ट्रीय सम्पदा क्षति निवारण अधिनियम के तहत कार्यवाही की जाये कावापाल के आदिवासियों ने कहा कि उनके लिए यह अधिनियम क्यों लागू नहीं होती???जबकि हमने प्रशासन की बेरुखी से हतास होकर गांव के भविष्य की उन्नति के लिये सड़क निर्माण की पहल पारम्परिक ग्रामसभा के निर्णय के अनुसार ही किये हैं। साथ ही प्रशासन से यह जवाब भी चाहिए की हमारे गांव तक सड़क का निर्माण क्यों किस अधिनियम के तहत नहीं किया गया है??? बिजली व मोबाइल नेटवर्क किस अधिनियम के तहत उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है???



सर्व आदिवासी समाज ने प्रशासन की कार्यवाही को संविधान  की अनिष्ठा व उल्लंघन बताया.



सर्व आदिवासी समाज बस्तर ने कमिश्नर बस्तर को पत्र लिख कर पारम्परिक ग्राम सभा कावापाल के प्रस्ताव की तथा संविधान में निहित पांचवी अनुसूची की पैरा 5 की अनिष्ठा व अवहेलना बताया, समाज ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 244(1) अनुसार ग्रामीणों पर वन विभाग की कार्यवाही असंवेधानिक व दोहरा रवैया है. समाज पुरे मामले में संवेधानिक कार्यवाही के पक्ष में है  नव प्रशिक्षु आई एफ एस मनीष कश्यप जिसे संविधान की पांचवीं अनुसूची की ज्ञान नहीं है उसकी बड़बोलेपन के कारण ही कावापाल के ग्रामीणों को ट्रक भेजकर राजीनामा करवाया जाएगा कहकर झूठ बोलकर जगदलपुर लाकर जेल में ठूसा गया है। अब समाज इस अधिकारी के द्वारा संविधान की 244(1), पांचवी अनुसूची की पैरा 5 की अनिष्ठा व उलंघन के एवज में ipc की राजद्रोह की धारा 124क व एट्रोसिटी एक्ट 1989 के तहत मामला दर्ज करने की मांग की है। इसके बाद भी प्रशासन एफआईआर दर्ज नहीं करेगी तो न्यायालय में याचिका लगाकर संविधान की उलंघन करने का मामला दर्ज करवाएगा। धुरवा समाज के पपू नाग व महादेव नाग ने कहा है कि गांव की विकास की कलई खुल गई इसलिए वन विभाग के द्वारा दोहरा कार्यवाही कर संविधान की उलंघन कर रहे हैं। सर्व आदिवासी समाज ने असंवैधानिक कार्यवाही को शून्य कर 56 आदिवासियों को तत्काल निरस्त कर मनीष कश्यप के खिलाफ राजद्रोह व एट्रोसिटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर इस घटना की निर्णय पारम्परिक ग्रामसभा कावापाल में  सड़क नहीं बनाने वाले अफसरों व वन विभाग की जिमेदार अफसरों की उपस्थिति में लिया जाएगा। विदित है कि अनुसूचित क्षेत्र की पारम्परिक ग्रामसभा को गांव की जल वन निर्माण की प्रबंधन व उपयोग का पूर्ण संवैधानिक बल प्राप्त है। आप को बता  दे बस्तर संभाग अनुसूचित क्षेत्र अन्तर्गत आता है जहा संविधान की पांचवी अनुसूची लागू है, जहा ग्राम सभा का प्रस्ताव सर्वमान्य होता है. 


गुरुवार, 28 सितंबर 2017

मावलीभाठा में सम्पन्न हुई संविधान की वार्षिक सेवा अर्जी...

पेसा कानून के इंजीनियर डॉ. बी.डी.शर्मा ने बुरुंगपाल में ही रह कर लिखा था पेसा कानून, वहा आज भी आस-पास के ग्रामीण संविधान की अर्जी करते है, आदिवासी मूल समुदाय आज भी संवेधानिक लड़ाई के पक्ष में है, संविधान में दिए सारे आधिकारो के तहत अपनी लड़ाई लड़ रहे है, मावलीभाठा वाह स्थल जहा पेसा कानून को लिखा गया था ग्रामीण अब भी उसकी अर्जी(पूजा) करते है..
बस्तर:-  बस्तर संभाग के बस्तर जिले के तोकापाल तहसील के बुरुंगपाल पंचायत अंतर्ग्रत मावलीभाठा में है भारत के संविधान की पत्थर गड़ी । प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी दिनाँक 27 सितंबर 2017 को बुरुंगपाल पंचायत के आसपास के 50 गांव के आदिवासी अनुसूचित जाति ओबीसी समुदाय के मांझी मुखिया गांयता पुजारी सिरहा की उपस्थिति मावलीभाठा में देकर  गांव की जिम्मीदरीन माता की सेवा अर्जी , मावली माता की सेवा अर्जी के बाद भारत के संविधान की अनुसूचित क्षेत्र एक्ससीलुडेड कॉन्सटीयूशन प्रावधान लिखित पत्थर गड़ी की परंपरा अनुसार बुरुंगपाल के माटी गांयता के द्वारा सेवा अर्जी की गई।
 जानकारी के अनुसार यह परंपरा विगत 22 सालों से मावली परघाव के दो दिन पूर्व सम्पन्न की जाती है। गाँव गणराज्य के गायता तिरूमाल कोसरू के द्वारा संविधान पीठ स्तंभ  एवं जिमेदारनीन याया की सेवा अर्जी करने के पश्चात संविधान में आदिवासीयो व पाँचवी अनुसूचित के प्रावधान अधिकार शक्तियों का वाचन , चर्चा परिचर्चा किया गया एवं वर्तमान में एक्ससीलुडेड एरिया की संविधान प्रावधान की संवैधानिक सभा पारम्परिक ग्रामसभा की प्रस्ताव निर्णय की जिला प्रशासन व शासन द्वारा लगातार उल्लघंन पर गम्भीर चिंता व्यक्त की गई।बूरूंगपाल सरपंच तथा तत्कालीन संघर्ष समिति (1992)के सदस्य एवं पेशा कानून के ड्रापटिंग कमेटी के सदस्य तिरूमाल सोमारू कर्मा ने उस दौरान पेसा कानून के इंजीनियर डॉक्टर बीडीशर्मा के योगदान को याद करते हूये कहा कि यदि शर्मा जी का सकारात्मक सहयोग नहीं मिलतता तो आदिवासी की जल जंगल जमीन की लड़ाई कमजोर हो जाती क्योकि "पेशा अधिनियम " इसी धरती "मावली याया" बूढालपेन " के आदिवासियों की  ग्राम गणराज्य की लड़ाई "मावा नाटे मावा राज" के  दहाड़ से बना है इस सच्चाई को  बहुत कम ही लोग जानते हैं कि पेशा कानून बुरूंगपाल में लिखा गया ।उस समय कुछ तथाकथित दलाल बाहरी लोग हमारी आवाज को दबाने का भरसक प्रयास किया किन्तु हम डिगे नही ।आज फिर हमारे अस्मिता के साथ खिलवाड़ हमारे रूढ़ी प्रथा कोयतुर संस्कृति रीति रिवाज को पर संस्कृति करण कर संक्रमित कर खत्म करने की साजिश कूछ दलाल कर रहे हैं हमें सचेत रहने की आवश्यकता हैं। घोर संघर्ष से हमारे आदिवासी योद्धाओं ने लड़कर एक्ससीलुडेड एरिया एक्ट जिसे इंडिया गवर्नमेंट act 1935 के कंडिका 91 92 में अंग्रेजों ने स्थान दिया प्राप्त किये। आगे के संविधान में इन्हीं एक्ससीलुडेड एरिया को अनुसूची पांच व अनुच्छेद 244 (1) में स्थान दिया गया। एक्ससीलुडेड एरिया आदिवासियों की स्वशासन के लिये हैं जिसे हम मावा नाटे मावा राज के नार बुमकाल के नाम से जानते हैं जिले सरकार ने ग्रामसभा का नाम दिया है। कर्मा ने समाज के युवाओं को आगाह करते हुए कहा कि लोकतंत्र की जड़ जन के मन में व गांवों में है। यह जन की लोकतंत्र पर आदिम समय से ही ग्रामसभाओं की भूमिका से होती है। लेकिन वर्तमान में सरकार द्वारा एक्ससीलुडेड क्षेत्रों की संवैधानिक प्रावधानों की खुलमखुला उल्लघंन किया जा रहा है मतलब लोकतंत्र की हत्या की जा रही है। जबकी सरकार को लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए। अनुच्छेद 13(3), 19(5,6),25, 244(1), 275, 330,332,340,342  की मूल भावना से परे कार्य हो रही है जो कि भावी पीढ़ी के लिये खतरे की घण्टी है। सरकार व जिला प्रशासन को चाहिए कि जनता के लिए स्थापित प्रावधानों की पूर्ण पालन करे। इस कार्यक्रम में पेसा कानून ड्राफ्टिंग कमेटी के तत्कालीन सदस्य सुलो पोयाम, डोले कर्मा उपस्थित थे। सर्व आदिवासी समाज के कार्यकारी अध्यक्ष बलदेव मौर्य ने कहा कि प्रशासन शासन एक्ससीलुडेड क्षेत्र की संविधान का पालन नहीं करने के कारण ही इन क्षेत्रों की समग्र विकास नहीं हो रही है और असंवैधानिक लोग बजट की लूट कर रहे हैं। संविधान के प्रावधानों की अनुपालन नहीं होने के कारण ही तीन स्तरीय पंचायत व्यवस्था में स्वशासन की मूल भावना ही गायब है। एक्ससीलुडेड क्षेत्र में संविधान का उल्लंघन के कारण ही युद्ध जैसे हालात बन गई है। इसका समाधान अनुसूचित क्षेत्र की प्रावधानों को पूर्ण रूप से लागू करने से 6 माह में हालात सामान्य हो जाएगा। अनुसूचित क्षेत्र में नगरीय निकाय असंवैधानिक है शासन प्रशासन अनुच्छेद 243zc का उल्लंघन कर रही है।  आदिवासियों के विकास के लिये 275 की फण्ड का बंदरबांट की जा रही है।  सुलो पोयाम ने कहा कि जिला प्रशासन ने पेसा कानून की मूल सिद्धांत को ही खत्म कर रही है पेशा कानून के अनुसार किसी भी ग्राम पंचायत में सरपंच पंच व सचिव बड़े नहीं हैं पारम्परिक ग्रामसभा बडी होती है। ग्रामसभा के निर्णय सर्व मान्य व सर्वोच्च हैं लेकिन आजकल इसके उलट व्यवस्था जिला प्रशासन द्वारा सरपंच व पंच को बड़ा बता दिखाकर ग्रामसभा के प्रस्ताव निर्णय को अमान्य किया जा रहा है जो कि संविधान के विपरीत है। सरपंच एक मात्र जनता के प्रतिनिधि हैं लेकिन यहां तो सरपंच तानाशाही व्यवस्था को लेकर पनप रहे हैं क्योंकि जिला प्रशासन उन्हें गलत दिशा दे रही है । इसी के कारण भूमि अधिग्रहण, योजनाओं का निर्माण, में फर्जी ग्रामसभाओं के द्वारा या बन्दूक के नोक पर प्रस्ताव बनाया जा रहा है जिससे जनता की विश्वास लोकतंत्र के ऊपर से डिगने लगी है जो कार्य गांव की जनता ने अस्वीकार कर दिया उसे कैसे थोप दी जाती है यह बहुत ही गम्भीर संकट है । सबसे दुर्भाग्य यह है कि यह हत्या सरकार के नुमाइंदे जो कि भारत सरकार की सेवार्थ हैं वे ही जनता की लोकतांत्रिक अधिकार की हत्या कर रहे हैं।  इस कार्यक्रम में सर्वआदिवासी  समाज बस्तर जिला के पदाधिकारी, स्थानीय विधायक, कोया कुटमा, अनुसूचित जाति, ओबीसी समाज के  पदाधिकारी व सदस्य 3000 के लगभग उपस्थित थे। मुख्य रूप से माटी पुजारी कोसरू कोया , तिरू दिपक बैज विधायक चित्रकोट, सुकलो मंडावी, सुलो पोयाम,  बलदेव मौर्य, गोवरधन कश्यप,हिड़मो मनडावी, भीमा वटटी,  डोले कर्मा , नार मुखिया, सिरहा, पुजारी, टोटम प्रमुख, कोटवार  व कोयतुर समुदाय के हजारों ग्रामीण उपस्थिति थे।